आज भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांतिवीर व ‘शेर-ए-बिहार’ योगेन्द्र शुक्ला की 123वीं जयंती पर विशेष प्रस्तुति

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जीवन परिचय

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वैशाली जिला मुख्यालय हाजीपुर से 20 किमी दूर नारायणी के तट पर बसे जलालपुर गाँव के एक भूमिहार ब्राह्मण किसान बाबु नन्हकू शुक्ला के पुत्र के रूप में योगेन्द्र शुक्ला का जन्म 30 अक्टूबर 1898 विजयादशमी को हुआ। इनके जन्म के कुछ वर्ष बाद ही इनकी माता का देहांत हो गया। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा गांव के पाठशाला में हुआ और मिडिल स्कूल लालगंज में शिक्षा प्राप्त किया।

मुजफ्फरपुर प्रवास

योगेन्द्र शुक्ला के चाचा मुजफ्फरपुर में कार्य करते थे और उन्होंने योगेन्द्र शुक्ला का सन 1913 में भूमिहार ब्राह्मण कॉलेजियट हाई स्कूल में नामांकन करा दिया। मुजफ्फरपुर में खुदीराम बोस की शहादत के बाद युवाओं में आजादी को लेकर काफी जोश था। आचार्य कृपलानी जी उस समय मुजफ्फरपुर भूमिहार ब्राह्मण कॉलेज एल. एस. कॉलेज में अंग्रेजी के प्राध्यापक थे। कृपलानी जी भी देश की स्वतंत्रता आंदोलन के समर्थक थे, जिनके साथ मुजफ्फरपुर के युवा और विद्वानों का जुड़ाव था। योगेन्द्र शुक्ला कृपलानी जी के साथ जुड़े और उनके भक्त हो गए। 1917 में चंपारण जाते हुये मुजफ्फरपुर में कृपलानी जी के आतिथ्य में महात्मा गांधी रुके जहाँ युवाओं ने इनका स्वागत किया। इस घटना को लेकर अंग्रेजी सरकार ने कृपलानी जी को गिरफ्तार कर लिया बाद में कृपलानी जी मुजफ्फरपुर छोड़कर BHU बनारस आ गए। योगेन्द्र शुक्ला जी भी पढ़ाई छोड़कर कृपलानी जी के साथ बनारस चले आए।

योगेन्द्र शुक्ल की प्रथम जेल यात्रा

1919-1920 में गांधी जी के आह्वान पर असहयोग आंदोलन शुरू हुआ, बनारस में प्रिंस ऑफ़ वेल्स के आगमन का विरोध करते हुए योगेन्द्र शुक्ला कृपलानी जी के साथ प्रथम बार जेल गए। जेल से छूटने के बाद योगेन्द्र शुक्ला कृपलानी जी के साथ साबरमती आश्रम गये। उनको गांधी जी के साथ रहने और उनकी सेवा का मौका मिला इसी दौरान देश की आजादी के लिये संघर्ष के सेनानियों से सम्पर्क हुआ। लेकिन योगेन्द्र शुक्ला को अहिंसा के माध्यम से आजादी प्राप्त करने के सिद्धांत पर विश्वास नही हुआ और शुक्ला जी 1924 में गांव लौट आये और घरवालो ने इनकी शादी कर दी।

क्रन्तिकारी योगेन्द्र शुक्ला

बनारस प्रवास के दौरान ही योगेन्द्र शुक्ल का सम्पर्क मन्मन्थनाथ गुत्प्त और रामप्रसाद बिस्मिल क्रांतिकारियों द्वारा गठित हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएसन के बहुत से क्रांतिकरियो से हो चूका था। हाजीपुर का गांधी आश्रम बिहार के क्रांतिकारियों का गढ़ और प्रशिक्षण स्थल था। जिसकी कमान बाबु किशोरी प्रसन्न सिंह के हाथों में थी। जहाँ बंगाल के क्रांतिकारियों का आना जाना रहता था। हाजीपुर में क्रांतिवीर बाबु बसावन सिंह शुक्ला जी के साथ हो गए और ये दोनों भी क्रन्तिकारी संघठन एचआरए से जुड़ गए। क्रांति के लिये बम पिस्तौल खरीदने के लिये ये क्रन्तिकारी सरकारी खजाने को लूटते थे। बाबु योगेन्द्र शुक्ला 6 फिट के गबरू जवान पक्के निशानेबाज थे। क्रन्तिकारी चन्द्रशेखर आजाद और भगत सिंह को हथियार चलाने की ट्रेनिग बेतिया के जंगलों में शुक्ला जी ने दिया। 1927 में भगत सिंह हाजीपुर गांधी आश्रम में क्रन्तिकारी साथियो के साथ कुछ दिन रहे और इन्ही क्रांतिकारियों की वजह से योगेन्द्र शुक्ला के चचेरे भतीजा बैकुंठ शुक्ला भी क्रांति संघठन में आ गए।

9 सितम्बर 1928 को दिल्ली के फिरोज साह कोटला के खण्डहरों में बंगाल, बिहार , पंजाब और आबद्ध प्रान्त के क्रांतिकारियों की मीटिंग में देश को आजाद कराने के लिये हिंदुस्तान सोसलिस्ट रिपब्लिक आर्मी की स्थापना हुई।जिसमे चन्द्रशेखर आजाद अध्यक्ष और फणीन्द्र नाथ घोष और मनमोहन बनर्जी को बिहार प्रभारी और योगेन्द्र शुक्ला और भगत सिंह नायक बनाये गये। क्रांतिकारियों द्वारा 30 अक्टूबर 1928 को लाल राजपत राय की हत्या का बदला सांडर्स की हत्या से लिया गया। 8 अप्रैल 1928 को सेंट्रल एसम्बली में बम फेंकने के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त गिरफ्तार कर लाहौर जेल भेजे गया । चन्द्रशेखर आजाद के निर्देश पर भगत सिंह को जेल से छुड़ाने ट्रेन से दिल्ली जाने के रास्ते में आगरा स्टेशन पर उन्हें गिरफ्त करने चढ़े पुलिस को देखने के बाद शुक्ला जी चलती मेल ट्रेन से कूद गए और किसी तरह पटना पहुँच गये पटना से गंगा नदी पर हाजीपुर आने के रास्ते में गण्डक पल पर दोनों और से पुलिस ने इन्हें घर लिया तब शुक्ला जी पुल से नदी में कूद गए और तैरते हुए 14 किमी दूर मारूफगंज रात्रि में पँहुचे।

अंडमान जेल यात्रा ,कालापानी

बाबु योगेन्द्र शुक्ला की दोनों जेब में लोडेड पिस्टल हमेशा रहता था।अंग्रेजी हुकूमत ने इनकी ग्रिफ्तारी पर 5000 का इनाम घोषित कर रखा था। पुलिस का सिपाही या दरोगा शुक्ला जी को देख कर अपना रास्ता बदल लेते थे लेकिन 11जून 1923 को शुक्ला जी सोनपुर मलखचक अपने एक साथी के घर सोये थे की एक गद्दार रामानन्द सिंह के इशारे पर अंग्रेजो की एक पल्टन ने शुक्ला जी को गिरफ्तार के बेरियो में जकड़ दिया। इन्हें अंग्रेजो की पुलिस द्वारा असीम यातनाये दी गई लेकिन शुक्ला जी द्वारा अपने किसी क्रन्तिकारी साथी का नाम नही बताया। शुक्ला जी को कालेपानी की सजा हुई और दिसम्बर 1932 में इन्हें अंडमान जेल भेज दिया गया। 1933 में अंडमान जेल में 47 दिन की भूख हड़ताल की वजह से शुक्ला जी बीमार पर गये और इनके एक आंख की रौशनी चली गई। 1937 में बिहार में डॉ श्रीकृष्ण सिंह मुख्य मंत्री बने और श्री बाबु के दबाव में बिहार के राजनितिक बंदियों को अंग्रेजी हुकूमत ने रिहा किया और 1938 मार्च मे योगेंद्र शुक्ल रिहा होकर बिहार आये।

राजनीति में प्रवेश

श्रीबाबू के कहने पर योगेन्द्र शुक्ला जी कोंग्रेस में शामिल हो गए और मुजफ्फरपुर जिला कोंग्रेस के अध्यक्ष बने और इनका सम्पर्क समाजवादी जेपी, रामबृक्ष बेनीपुरी, नरेंद्र देव जैसे नेतायों के साथ हुआ। योगेन्द्र शुक्ल स्वामी सहजानन्द सरस्वती के किसान आंदोलन से भी जुड़े और 1940 में अखिल भारतीय किसान सभा के केंद्रीय समिति के सदस्य बने ।1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने पर इन्हें गिरफ्तार कर हजारीबाग जेल भेज गया, जहाँ जय प्रकाश नारायण, स्वामी सहजानन्द, रामबृक्ष बेनीपुरी, सुरज नारायण सिंह, रामनन्दन मिश्र, वगैरह बन्द थे। अगस्त 1942 को योगेन्द्र शुक्ला, सालिग्राम सिंह, सूरज नारायण सिंह के साथ जेपी को अपने कंधे पर उठा कर जेल से फरार हो गए। बीमार जेपी को शुक्ला जी ने 124 किमी गया पहुचने तक अपने कंधे पर बिठाये रखा।

हनुमान नगर जेल ब्रेक कांड नेपाल 

देश को आजाद करने के उद्देश्य से राम मनोहर लोहिया, सूरज नारायण सिंह ,बेनीपुरी और अन्य समाजवादियों ने कोसी नेपाल के बैनर झूला में आजाद दस्ता का गठन किया और सदस्यों को हथियार चलाने की ट्रेनिग दी जाने लगी जिसकी जानकारी होने पर अंग्रेजो ने नेपाल नरेश की पुलिस से इन लोगो को गिरफ्तार कर नेपाल के हनुमान नगर जेल में रखा गया और अंग्रेजो को सोपने की तैयारी थी। जेपी और लोहिया की गिरफ्तारी की सूचना मिलने पर योगेन्द्र शुक्ला हाजीपुर के कुछ साथी रामनन्दन सिंह , सूरज नारायण सिंह के साथ मिलकर हनुमान नगर जेल से जेपी, लोहिया सहित सभी बंदियों को सकुशल बिहार ले आये।

प्रजा सोसलिस्ट पार्टी का गठन 

1947 में आजादी के बाद राममनोहर लोहिया, जेबी कृपलानी, राम बृक्ष बेनपुरी, वीर बसावन सिंह, सूरज नारायण सिंह इत्यादि नेतायों का कांग्रेस से मोह भंग हो गया क्यों की अंग्रेजो के पिठु जमींदार और अंग्रेजो का साथ देने वाले पूंजीपति सभी कांग्रेस में गये और इनके सामने देश की आजादी की लड़ाई लड़ने बालो की कोंग्रेस में कोई पूछ नही रही और इनलोगो ने प्रजा सोसलिस्ट पार्टी का गठन किया।

1952 में प्रथम चुनाव

आजादी के बाद बिहार बिधान सभा चुनाव 1952 में योगेन्द्र शुक्ला प्रजा समाजवादी से लालगंज विधानसभा से खड़े हुए। कांग्रेस की और से साइन के जमींदार घराने से ललितेश्वर प्रसाद शाही खरे हुए। इनके पास पैसे की कमी नही थी चुनाव के दिन कांग्रेस की और से बूथ पर पूरी जलेवी का भोज हुआ और पूरी जलेवी का भोज खाकर शाही को जीत दिया और शुक्ला जी चुनाव हार गये।

विधान परिषद के सदस्य

बाबु योगेन्द्र शुक्ल प्रजा समाजबादी दल से 1958 में 2 वर्ष के लिये विधान परिषद के सदस्य बने। देश की आजादी के लिये अपने जीवन की आहुति देने वाले बाबु योगेन्द्र शुक्ल ने किसी के सामने सहायता के लिये हाथ नहीं पसारे। जीवन के अंतिम समय बीमारी की वजह से लचर हो गए और 19 नवंबर 1965 को PMCH में आखरी सांस ली।

डाक टिकट जारी

इस अमर सेनानी बाबु योगेन्द्र शुक्ला के नाम पर कोई संस्था इस जिले में नहीं है। इनके पैतृक गांव में इन्ही की जमीन पर श्री देवेश चन्द्र ठाकुर एमएलसी के फंड से एक मूर्ति स्थापित हुई है। जिसका वर्ष 2015 में मुख्यमंत्री द्वारा उद्घाटन हुआ है। वाजपेयी सरकार ने योगेन्द्र शुक्ला जी और बैकुंठ शुक्ला जी के सम्मान में संयुक्त डाक टिकट जारी किया गया।

इस महान पुरुष पर हमें गर्व है, इन्हें शत शत नमन।

लेखक

धीरज कुमार
धरहरा, हाजीपुर, वैशाली

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