– आर.के. सिन्हा एक मशहूर बिजनेस अखबार ने कुछ दिनों पहले यह खबर प्रकाशित कर दी कि भारत के प्राइवेट सेक्टर में नए साल 2023 में महिलाओं की भर्तियों में तेजी आएगी। जब अधिकतर अखबारों तथा खबरिया चैनलों में निराशाजनक खबरों की भरमार रहने लगी है, तब किसी भी इंसान को उपर्युक्त खबर को पढ़कर सुकून तो मिलना ही चाहिए। इसमें कोई शक नहीं है कि किसी भी देश और समाज की पहचान इस बात से ही होती है कि वहां पर महिलाएं आर्थिक रूप से कितनी स्वावलंबी हैं। वे स्वावलंबी तो तब ही होंगी जब उन्हें सही ढंग से शिक्षित किया जाएगा और उन्हें रोजगार में पर्याप्त अवसर मिलेंगे। अपने पुरुष साथियों के बराबर दायित्व तथा वेतन भी मिलेगा। बेशक, जिन कंपनियों में महिला मुलाजिम होती हैं वहां पर माहौल सकारात्मक तो रहता ही है। इसलिए किसी दफ्तर का समावेशी होना बहुत जरूरी है।

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दरअसल लार्सन एंड टूब्रो (एलएंडटी), आईटीसी, सिप्ला, प्रॉक्टर एंड गैंबल, एचडीएफसी बैंक आदि ने घोषणा भी कर दी है कि वे वर्ष 2023 में महिला पेशेवरों को नौकरी देते वक्त कई तरह की सुविधाएं भी देंगे। उदाहरण के रूप में यदि किसी महिला कर्मी के पति या परिवार का किसी अन्य शहर में ट्रांसफर हो जाता है तो उसे भी वहां पर ट्रांसफर कर दिया जाएगा। मातृत्व अवकाश की समय सीमा भी बढ़ाई जा सकती है।

देखिए कोई बच्चों का खेल नहीं है एक कार्यशील महिला का होना। कार्यशील महिलाओं को घर के भी तमाम काम तो करने ही पड़ते हैं। आमतौर पर दफ्तर से घर आने के बाद हमारे यहां अब भी पतिदेव तो टीवी देखने में ही समय बिताने लगते हैं। पर कार्यशील महिला को यह छूट नहीं है। उसे रसोई भी देखनी होती और अपने बच्चों को पढ़ाना भी होता है। उसे ही बच्चों के स्कूल में पेरेंट्स टीचर्स मीटिंग में भी हाजिरी देनी होती है। इस लिहाज से प्राइवेट सेक्टर उन्हें कुछ अतिरिक्त सुविधाएं देकर बहुत उपकार करेगा।

बेशक, अब महिलाएं भारतीय कार्यबल का एक अभिन्न अंग बनाती हैं। फैक्ट्री ऐक्ट (कारखाना अधिनियम) 1948, सेक्शन (खंड) 66(1)(बी), के अनुसार किसी भी महिला को किसी भी कारखाने में 6 बजे सुबह से लेकर शाम 7 बजे के बीच के समय के अलावा काम करने की अनुमति नहीं है। इस कानून का सख्ती से पालन होना चाहिए। इसका उल्लंघन करने पर सख्त कार्रवाई हो। इसी तरह से बीड़ी और सिगार वर्कर (रोजगार की शर्तें) ऐक्ट 1966, सेक्शन (धारा) 25 के अनुसार किसी भी महिला को 6 बजे सुबह से लेकर शाम 7 बजे के बीच के समय के अलावा औद्योगिक परिसर में काम करने की अनुमति नहीं है।

इस बीच, भारत के आईटी सेक्टर में महिला पेशेवरों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है। टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस), इंफोसिस, विप्रो, टैक महिंद्रा और माइंडट्री जैसी भारत की चोटी की आईटी कंपनियों में 31 दिसंबर, 2021 तक 10 कर्मचारियों में कम से कम 3 महिलाएं यानी कुल कार्यबल का 3० प्रतिशत थीं। भारत की प्रमुख आईटी सेवा कंपनी टीसीएस में महिला कर्मचारियों की संख्या लगातार औसतन 40 प्रतिशत के आसपास चल रही है। वहीं इन्फोसिस में महिला कर्मचारियों की संख्या भी 40 प्रतिशत है।

अब भी हमारे यहां कई प्रतिभाशाली महिलाएं माँ बनने के बाद नौकरी छोड़ देती हैं। माँ बनने के बाद दो-तीन साल का समय काफी मुश्किल भरे होते हैं। कैसे अपने बच्चे को घर पर छोड़ने के विचार से उनकी हिम्मत टूट जाती है। इस स्थिति को देखते हुए अब कंपनियों ने दफ्तर में ही क्रेच सुविधा देनी चालू कर दी है। अगर हो सके तो कंपनियों को अपनी महिला कर्मियों को वर्क फ्रॉम होम की सुविधा देते हुए उदारता का परिचय भी देना चाहिए। हां, कंपनियां अपनी वर्क फ्रॉम होम सुविधा का लाभ लेने वाली महिलाओं को हफ्ते-दस दिनों में एक बार दफ्तर रिव्यू के लिए बुला ही सकते हैं। यह सत्य है कि महिला कर्मी अपने दफ्तर के दायित्वों के प्रति ज्यादा ईमानदार और निष्ठावान रहती हैं।

इस बीच, सरकार को उन कंपनियों के धूर्त प्रबंधन पर एक्शन लेना चाहिए जो अपनी महिला कर्मियों को मेटर्निटी बेनिफिट देने तक में कोताही बरतते हैं। मेटर्निटी बेनिफिट ऐक्ट 1961, बच्चे के जन्म से पहले और बाद में निश्चित प्रतिष्ठानों में निश्चित अवधि के लिए महिला श्रम को नियंत्रित करता है और मातृत्व लाभ प्रदान करता है। इसके साथ ही भवन एवं अन्य कंस्ट्रक्शन (रोजगार और सेवा की शर्तों का विनियमन) अधिनियम, 1996 महिला लाभार्थी को मातृत्व लाभ के लिए वेलफेयर फंड (कल्याण निधि) प्रदान करता है।

ये सच है कि कार्यशील औरतें अपने काम के साथ पूरा न्याय करती हैं। जीवन का कोई क्षेत्र नहीं बचा जहां अब ये न हों। ये सरकारी और निजी क्षेत्र की कंपनियों में भी शिखर पदों पर पहुंच रही हैं। सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों जैसे हिन्दुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल) तथा ऑयल एंड नैचुरल गैस कॉरपोरेशन (ओएनजीसी) में महिलाएं सब पदों पर हैं। इनका शिखर तक पहुंचना इस बात की गवाही है कि अब महिला पेशेवरों को सरकारी उपक्रमों के सबसे अहम पदों पर भी काम करने के अवसर मिलने लगे हैं। पर अब भी बॉम्बे शेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनियों के बोर्ड में सिर्फ 18 फीसद महिलाएं हैं। यह संख्या तो बढ़ाई ही जानी चाहिए। 18 % को 28-30% तक ले जाने में तो कोई समस्या नहीं होनी चाहिये। मान कर चलिए जब इन कंपनियों में सीईओ तथा डायरेक्टर के पदों पर महिलाओं की संख्या बढ़ेगी तो इसका असर दूर तक होगा। उसी स्थिति में और उसी अनुपात में महिलाओं की भर्तियां भी बढ़ेगी।

दुर्गा, सीता और गांधारी की पूजा करने वाले भारत में आधी दुनिया को उसका हक तो देना ही होगा। ये जितनी जल्दी दे दिया जाए उतना ही अच्छा होगा। सारे देश को ठोस कोशिशें करनी होंगी ताकि बच्चियां स्कूल जाएं और खूब पढ़ें। पूर्ण शिक्षित होने के बाद उन्हें उपयुक्त रोजगार मिले। बहरहाल, यह संतोष का विषय है कि अब तमाम दफ्तरों में महिलाएं काम करती हुई मिलती हैं। उनके विश्वास से लबरेज चेहरों को देखकर समझ में आ जाता है कि वह अब अपने हिस्से का आसमान छूने लगी हैं।

(लेखक, वरिष्ठ संपादक, स्तंभकार और पूर्व सांसद हैं।)

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