अन्तरराष्ट्रीय पुरुष दिवस पर विशेष प्रस्तुति : ‘आप पुरुष ही नहीं, महापुरुष हैं’

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हर वर्ष 19 नवम्बर को अंतराष्ट्रीय पुरुष दिवस के रूप में मनाया जाता है। पूरा विश्व इस दिन पुरुषों के प्रति अपनी समर्पिता और कृतज्ञता व्यक्त करता है। बीते कुछ वर्षों से भारत में भी इसका प्रचलन बढ़ा है और लोग इसे मनाने भी लगे हैं। ऐसे में आज के दिन एक अवलोकन तो बनता ही है कि कैसे फिल्मों को पुरुषों ने विकसित किया।
अंदाज़ अपना – अपना का यह डायलाग कि “आप पुरुष ही नहीं महापुरुष है” , काफ़ी सटिक बैठता है हमारे फिल्मों से जुड़े पुरुष कलाकारों के लिए।
दादा साहब फाल्के को भारतीय सिनेमा का जनक कहा जाता है , वर्ष 1913 में उनके द्वारा पूर्ण अवधी की फिल्म राजा हरिश्चंद्र के निर्माण से ही भारत में फिल्मों का बिगुल बज गया। भाँति – भाँति से कलाकारों में कैमरे के सामने प्रदर्शन करने की अलख जागने लगी।

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आप में से कइयों को शायद ही ये पता हो कि शुरुआती दौर में फिल्मों के सारे काम केवल और केवल पुरुष ही किया करते थे , यहां तक कि महिलाओं के किरदार भी पुरुष ही महिला सजकर किया करते थे। वर्ष 1913 में ही मोहिनी भस्मासुर के द्वारा इस निषेध को तोड़ने की कोशिश दादा साहेब फाल्के के द्वारा की गयी जब उन्होंने पहली बार महिला किरदार के लिए अभिनेत्री दुर्गाबाई कामत का चयन किया लेकिन पूर्ण रूप से फिल्मों में महिलाओं का प्रदापर्ण होने में और 20 वर्ष लग गए और देविका रानी के रूप में पहली महिला फिल्म अभिनेत्री का दौर शुरू हुआ, तब तक फिल्मों के निर्माण में केवल और केवल पुरुष ही होते थे।

अर्देशिर ईरानी वे पुरुष निर्देशक थे जिन्होंने भारतीय सिनेमा को पहली बोलती फिल्म ‘आलम आरा’ दी। साथ ही उन्होंने भारत की पहली ‘किशन कन्हैया’ का भी निर्माण किया था।
आज़ादी के बाद भारतीय सिनेमा का स्वर्ण युग शुरू हुआ जिसमें कई पुरुष निर्देशकों, अभिनेताओं, गायकों, लेखकों ने विश्वव्यापी स्तर पर भारतीय सिनेमा को पहचान दिलाई जिनमें प्रमुख रूप से सत्यजीत रे, बिमल रॉय, रित्तिक घटक, पृथ्वीराज कपूर, कुंदन लाल सहगल, गुरुदत्त, अशोक कुमार, चित्तोर वी नागया, वेमुरी गगईया, सी पुलईया, बलिजेपल्ली लक्ष्मीकांत कवि, राज कपूर, बलराज साहनी, सुनील दत्त, सचिन देव बर्मन, विजय आनंद, रौशन इत्यादि का नाम लिया जाता है।

भारतीय फिल्मों में स्टारडम की शुरुआत के लिए भी पुरुषों को ही जाना जाता है और ये दौर शुरू हुआ राजेश खन्ना जैसे अभिनेताओं से जिसके बाद धर्मेंद्र, शम्मी कपूर, राजेंद्र कुमार, जीतेन्द्र, शशि कपूर, दिलीप कुमार, मनोज कुमार, राज कुमार, दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन, गोविंदा , शाहरुख़ खान, संजय दत्त इत्यादि जैसे अनेकों सुपरस्टार भारतीय सिनेमा ने देश – दुनिया को दिए। एक अनुमान के मुताबिक़ भारतीय सिनेमा के 100 वर्ष के इतिहास में समय – समय पर कई अभिनेताओं का दौर चला और जिन्होंने स्टारडम का स्वाद भी चखा जिसकी गिनती की जाए तो ये आंकड़ा भी 100 के पार ही जाएगा।

चरित्र अभिनेताओं की अगर बात की जाए तो इसकी भी एक बड़ी तालिका है जिनमें प्रमुख रूप से महमूद, ओम प्रकाश, संजीव कुमार, अमरीश पुरी, रणजीत, जॉनी वॉकर इत्यादि प्रमुख हैं। गायन एवं संगीत के क्षेत्र में सचिन देव बर्मन, राहुल बर्मन, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, नौशाद, किशोर कुमार, मोहम्मद रफ़ी, मुकेश, महेंद्र कपूर इत्यादि जैसे नाम बहुत प्रचलित हैं।
कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि भारतीय सिनेमा के कर्णधार हमेशा से ही पुरुष रहे हैं और अब भी यह सिलसिला निरंतर जारी है। जिस तरह से सिनेमा को पहचान दिलाने में पुरुषों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है , उसके लिए अंतराष्ट्रीय पुरुष दिवस के दिन उनके योगदानों को याद करना तो बनता ही है।
तो अगर आप भी पुरुष दिवस के अवसर पे अपनी निष्ठता पुरुषों के प्रति जाहिर करना चाहते हैं और इसके लिए फिल्मों से जुड़े किसी पुरुष कलाकार का चयन करते हैं तो उनकी जीवनी से जुड़े रोचक पहलुओं को जानने की कोशिश कीजिये और साथ ही दोस्तों के बीच साझा भी कीजिये। आप हमें भी अपनी टिपण्णियों के द्वारा बता सकते हैं।

लेखक,बद्रीनाथ साव
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