डॉ. वेदप्रताप वैदिक                              नई महामारी ओमिक्रॉन भारत में अभी तक वैसी नहीं फैली है, जैसी कि कोरोना की महामारी फैल गई थी। फिर भी दुनिया के विकसित देशों में उसने काफी जोर पकड़ लिया है। भारत के 17 राज्यों में अभी तक साढ़े तीन सौ से अधिक मामले सामने आए हैं। अभी महामारी चाहे न फैली हो लेकिन उसका डर फैलता जा रहा है। कई राज्य सरकारों ने रात का कर्फ्यू लागू कर दिया है और कुछ ने दिन में भीड़-भाड़ पर भी तरह-तरह के प्रतिबंध लगा दिए हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने तो यहां तक कह दिया है कि उत्तर प्रदेश के चुनावों को अभी टाल दिया जाए तो बेहतर होगा। दिल्ली के उच्च न्यायालय ने भी सरोजनी नगर के बाजारों की भीड़ पर चिंता व्यक्त की है।

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असलियत तो यह है कि पिछले कई माह से घरों में कैद लोग अब दुगुने उत्साह से बाहर निकल रहे हैं। डर यही है कि चुनावों के दौरान होने वाली विशाल जनसभाओं में कहीं लाखों लोग इस नई महामारी के शिकार न हो जाएं। हमारे नेता भी गजब कर रहे हैं। वे बाजारों, शादियों और अन्य समारोहों में तो 200 लोगों की पाबंदियां लगा रहे हैं लेकिन दो-दो लाख की सभाओं को खुद आयोजित करेंगे। प. बंगाल और बिहार में हुए चुनावों के दौरान यही हुआ। लाखों लोग कोरोना की चपेट में आ गए।
अब उप्र, पंजाब, उत्तराखंड, गोआ और मणिपुर के चुनाव सिर पर हैं।

इन राज्यों में चुनाव का पूरा इंतजाम करने में चुनाव आयोग जुटा हुआ है। मुख्य चुनाव आयुक्त आजकल इन राज्यों के दौरे भी कर रहे हैं। इसमें शक नहीं कि निष्पक्ष और प्रामाणिक चुनाव-प्रक्रिया की तैयारी काफी अच्छी है लेकिन पांच राज्यों में इस चुनाव के कारण यदि महामारी फैल गई तो आम जनता को भयंकर परेशानी का सामना करना पड़ेगा।

यह ठीक है कि देश के ज्यादातर लोगों को टीका लग चुका है लेकिन उन लोगों में से भी कई नई महामारी के शिकार हो चुके हैं। सभी पार्टियां चाहेंगी कि चुनाव निश्चित समय पर जरूर हों, उन्हें जीतकर सरकार बनाने की ललक चढ़ी रहती है। उक्त पांच राज्यों में से चार में भाजपा की सरकारें हैं। उनकी खास

जिम्मेदारी है। यदि वे सब मिलकर चुनाव आयोग से आग्रह करें तो वह इन चुनावों को 4-6 माह के लिए स्थगित कर सकता है। इस बीच राज्यों में राष्ट्रपति शासन या कार्यकारी मुख्यमंत्री की नियुक्ति भी हो सकती है। यों भी चुनाव आयोग को अधिकार है कि वह आत्मनिर्णय के आधार पर चुनावी तारीखों को आगे खिसका सकता है।

यदि महामारी लंबी खिंच जाती है तो उसका भी हल खोजा जा सकता है। भारत में लगभग 90 करोड़ लोगों के पास मोबाइल फोन और इंटरनेट की सुविधा है। आजकल डिजिटल तकनीक इतनी विकसित हो गई है कि लोग घर बैठे मतदान कर सकते हैं। फिलहाल, बेहतर तो यही होगा कि इन प्रांतीय चुनाव को अभी टाल दिया जाए।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और जाने-माने स्तंभकार हैं।)

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