अपने ही गढ़ में ‘जोश’ में नहीं है कांग्रेस, 2022 में बच पायेगा कांग्रेस का किला!

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रायबरेली : पूरे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा कार्यकर्ताओं में जोश जगा रही हैं लेकिन उनके ही गढ़ में स्थिति इसके बिल्कुल उलट है। टिकट दावेदार से लेकर आम कार्यकर्ता व संगठन तक सब जोश की बात छोड़िये, अभी भी चुनावी मोड में भी नहीं आ सके हैं। पार्टी के लिए रायबरेली के राजनीतिक इतिहास में ऐसा शायद पहली बार हो रहा है। जिलाध्यक्ष पंकज तिवारी कहते हैं ‘पार्टी जिले में पूरी मजबूती से लड़ने जा रही है, टिकट आवेदकों की संख्या बहुत है जल्द ही फ़ाइनल हो जाएगा।’

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रायबरेली में कांग्रेस केवल दो सीटों पर टिकट की घोषणा कर पाई है, जबकि अभी भी चार सीटों पर उम्मीदवार तय करना बाकी है। हालांकि टिकट बँटवारे के मामले में कांग्रेस यूपी में अन्य दलों से आगे रही है लेकिन यहां ऐसा नहीं है। बाकी चार सीटों में रायबरेली सीट पर अदिति सिंह के पार्टी छोड़ने के बाद कांग्रेस यहां से कोई कद्दावर नेता नहीं खोज पा रही है। जिनके आवेदन अभी तक मिले हैं उनसे बहुत उम्मीद पार्टी को भी नहीं है। हालांकि प्रियंका इस सीट से किसी महिला को चाहती हैं जो अदिति सिंह के मुकाबले में आ सके और चर्चा है कि उन्हीं के परिवार से उम्मीदवार बनाया जा सकता है।

कांग्रेस के लिए हरचंदपुर में ही हालात मजबूरी वाले ही हैं, जहां पार्टी की निगाह इस पर है कि किसे समाजवादी पार्टी उम्मीदवार बनाती है। दरअसल यहां से सपा के पूर्व विधायक सुरेंद्र सिंह व 2017 में भाजपा उम्मीदवार राहुल लोधी सपा से टिकट के प्रबल दावेदार हैं जो भाजपा के संभावित उम्मीदवार राकेश सिंह को कड़ी टक्कर दे सकते हैं। अब मजबूत दावेदारों की कमी से परेशान कांग्रेस की निगाहें सपा की ओर हैं कि किसे टिकट मिलता है, जिसका टिकट कटेगा, कांग्रेस उसे निराश भी नहीं करेगी और उसके सहारे चुनाव में जाने की सोचेगी।

ऊंचाहार विधानसभा में भी कांग्रेस की असहज स्थिति बन गई है। स्वामी प्रसाद मौर्य के सपा में शामिल होने के बाद कांग्रेस के मजबूत नेता दूसरी पार्टियों की ओर मन बना रहे हैं, कयास लग रहे हैं कि भाजपा से यहां उम्मीदवार कांग्रेस का कोई बड़ा नेता हो सकता है। ऐसे में यहां भी पार्टी के लिए मुश्किलें है और कोई जिताऊ उम्मीदवार खोजना मुश्किल लग रहा है। सरेनी का हाल भी कुछ ऐसा ही है जहां 2007 में विधायक रहे अशोक सिंह पार्टी के प्रबल दावेदार है, लेकिन कई अन्य दावेदार भी हैं जिनमें महिलाएं भी हैं। बावजूद इसके अभी तक पार्टी कोई निर्णय नहीं ले पाई है, जिससे कार्यकर्ताओं में निराशा है।

गौरतलब है कि टिकट के दावेदारों में ही जहां कोई उत्साह नजर नहीं आ रहा है, वहीं कार्यकर्ता भी कहीं सक्रिय नहीं दिख रहे हैं। संगठन, नेताओं और कार्यकर्ताओं में यह सुस्ती आश्चर्यजनक है। ऐसे में पार्टी चुनाव में क्या करिश्मा कर पायेगी, यह बड़ा प्रश्न है जबकि कांग्रेस के लिए रायबरेली में यह केवल सामान्य चुनाव नहीं है। हर हालात में पार्टी ने अपने गढ़ को जरूर बचा रखा था लेकिन 2022 की कहानी कुछ अलग ही बयां कर रही है।

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